
अपने पिता द्वारा अर्जित बहुत बड़े राज्य को पाकर राजा बिंदुसार को उतना हर्ष नहीं हुआ था, जितना कि अपने गुणों से अर्जित चंपानगरी की उस ब्राह्मण-कन्या को पाकर। ब्रह्मभवन में वैसी छटा नहीं थी, जैसी के पाटलिपुत्र के राज-भवन में उस कन्या के होने से। इस प्रकार की विविध लालित्यपूर्ण बातों का चिंतन करते हुए राजा ने उस रमणी-रत्न को पाने की मन में चाहत बनाई।
राजा ने उस कन्या का नाम ‘शुभा’ रखा और अकेले में राजकीय कार्यों के लिए उससे परामर्श लेना प्रारंभ किया, जो एक प्रकार से साचिव्य (सचिवपन) का रूप बन गया। इस प्रकार वे दोनों प्रेम की जंजीरों में और गहराई से बंध गए। प्रेमपास से बंधे राजा बिंदुसार ने शुभा को साथ लेकर स्तूपों, चैत्यों, देवस्थानों आदि की सैर कराई और दिखाया भी।
इस प्रकार समय बीतता गया और शुभा गर्भवती हो गई। राजा ने पुंसवन आदि संस्कार कराए। यथासमय उसने पुत्ररत्न को जन्म दिया। राजा ने शुभा की कोख से भूमि पर आने पर अपने पुत्र को गोद में उठा लिया। पुत्र के रोदन को राजा ने धर्मघोष-प्रवर्तन माना। शुभा पुत्ररत्न को देखकर अत्यंत हर्षित हुई और पुत्र को तेजस् का महान निधि या भंडार (खजाना) माना। पुरोहित ने यथासमय और यथाविधि जातकर्म संस्कार कराया।
अशुचि-काल के बीत जाने पर नामकरण संस्कार का अवसर आया। उस समय पर शुभा ने यह उद्गार व्यक्त किया कि पुत्र का नाम ‘अशोक’ रखा जाए ताकि यह धरती पर इसी नाम से विख्यात हो। मैं भी इसके पैदा होने पर ‘अशोका’ हो गई हूं। वहां उपस्थित लोग (प्रजा-जन) इस बात को अत्यंत हर्षित हुए। राजा अत्यंत प्रसन्न हुआ और वहां उपस्थित सभी सामंतों ने गौरवान्वित होकर प्रसन्नतापूर्वक शिशु को प्रणाम किया।
