
महात्मा बुद्ध ने कहा कि संसार दुखमय है। (सर्वम दुखं दुखम्) और दुख का कारण तृष्णा है। बुद्ध ने कर्म के सिद्धांत पर बल दिया उन्होंने आत्मा के अस्तित्व को अस्वीकार किया तथा वर्ण व्यवस्था की घोर निंदा की। बुद्ध ने ‘प्रतीत्यसमुत्पाद’ (अर्थ- संसार की सभी वस्तुएं किसी न किसी कारण से उत्पन्न हुई हैं और इस प्रकार वे इस पर निर्भर हैं) को संपूर्ण जगत पर लागू किया।’प्रतीत्यसमुत्पाद’ द्वितीय और तृतीय आर्य सत्य के अंतर्गत आता है। उन्होंने निर्वाण प्राप्ति के लिए ‘अष्टांगिक मार्ग’ सिद्धांत का प्रतिपादन किया, जो निम्न हैं- (1) सम्यक् दृष्टि, (2) सम्यक् संकल्प,(3) सम्यक् वाक्/ वाचन,(4) सम्यक् कर्म,(5) सम्यक् जीविका,(6) सम्यक् व्यायाम/ प्रयास, (7)सम्यक् स्मृति, (8)सम्यक् समाधि । वैदिक धर्म के कर्मकाण्डों व अनुष्ठानों के विपरीत उन्होंने नैतिकता पर बल दिया। उनका कहना था कि इन आठ मार्गों को अपना कर व्यक्ति बिना किसी पुरोहित की सहायता और यज्ञ संपादित किये निर्वाण प्राप्त कर सकता है । उन्होंने पशु बलि की घोर निंदा की और अपने अनुयायियों को आचार नियम बताये- (1) पराये धन का लोभ नहीं करना । (2) हिंसा नहीं करना (3) नशे का सेवन नहीं करना (4) असत्य नहीं बोलना (5) दुराचार से दूर रहना । महात्मा बुद्ध ने ‘मध्यम मार्ग’ का प्रतिपादन किया अर्थात् न अत्यधिक कठोर संयम और न ही अत्यधिक विलासिता पूर्ण जीवन। उनके बताए सामाजिक आचार नियम लगभग सभी धर्मों द्वारा बताए गए हैं।बौद्ध धर्म को मानने वालों में निम्न वर्णों के व्यक्ति अधिक थे क्योंकि इसने वर्ण व्यवस्था की निंदा की गयी है । जातिरेका मनुष्याणां भिन्नास्ते कर्मभि: स्वकै: । इत्येतद् देशितं बुद्धैर्नृजात्येकत्ववादिभि: ।। नृणामाहारभेदेऽपि नृजातिर्न हि भिद्यते । अखण्डैका नृजातिर्हि विविधाहारसेविनी । ।(अशोकाभ्युदयकाव्यम्-सुत्तपिटक) ।। बौद्ध धर्म में ईश्वर और आत्मा के अस्तित्व को नकारा गया । बौद्ध संघ का दरवाजा हर वर्ण, स्त्री-पुरुष सभी के लिए खुला था जिससे समानता की भावना का विकास हुआ। ब्राह्मण धर्म की अपेक्षा बौद्ध धर्म अत्यधिक उदार और उसमें जनतंत्र के विचार प्रभावी थे, इसीलिए बौद्ध धर्म तत्कालीन उदित धर्मों में सबसे लोकप्रिय हुआ तथा भारत के बाहर भी इसके अनुयायियों की संख्या बढ़ी। आज भी बौद्ध धर्म अनेक देशों का प्रमुख धर्म है। महत्वपूर्ण तथ्य-•”बुद्ध पूर्णिमा” बौद्धों का महत्वपूर्ण त्यौहार है जो वैशाख की पूर्णिमा को होता है। इसी दिन बुद्ध का जन्म, ज्ञान की प्राप्ति एवं महापरिनिर्वाण की प्राप्ति हुई थी। • संघ में प्रविष्ट होने को ‘उपसंपदा’ कहते थे। • बौद्ध संघ की सभा में प्रस्ताव का पाठ होता था जिसे ‘अनुसावन’ कहते थे। •बौद्ध भिक्षु नागार्जुन ने प्रथम सदी ई. में चीन जाकर बौद्ध कृतियों का चीनी भाषा में अनुवाद किया । •छठी शताब्दी ईसा पूर्व में बौद्ध, जैन एवं अनेक धार्मिक संप्रदायों के उदय के साथ ही ब्राह्मण धर्म की जटिलताओं के विरुद्ध भागवत धर्म, शैव धर्म एवं शाक्त धर्म का भी उदय हुआ जो हिंदू धर्म की ही शाखा थे।
•चार भावनाएं- सर्वं क्षणिकं-क्षणिकम् , सर्वं दु:खं-दु:खम्, सर्वं शून्यं-शून्यम् , सर्वं स्वलक्षणं-स्वलक्षणं । •चार आर्य सत्य-(1) दु:ख,(2) दु:ख समुदय,(3) दु:ख निरोध,(4) दु:ख निरोध मार्ग । •बारह आयतन- ज्ञानेन्द्रियाणि पञ्चैव, तथा कर्मेन्र्दियाणि । मनो बुद्धिरिति प्रोक्तं, द्वादशायतनं बुधै: ।। • पञ्च स्कन्ध- दु:खं संसारिण: स्कन्धा:,ते च पंच प्रकीर्तिता: । विज्ञानं वेदना संज्ञा, संस्कारो रूपमेव च ।। • बौद्ध धर्म में दो प्रमाण और चार प्रस्थानिक माने गये हैं- प्रत्यक्षमनुमानं च ,प्रमाणद्वितयं तथा । चतुष्प्रस्थानिका बौद्धा: ,ख्याता वैभाषिकादय: ।। •चार प्रस्थानिक-माध्यमिक, योगाचार, सौत्रान्तिक और वैभाषिक ।
