Ashoka The Great (chapter 3) अशोक-मातृ-वर्णन

वह मांं अत्यन्त धन्य है जिसने अशोक को जाना और वे नाना भी धन्य हैं, जिसका नाती (दौहित्र धेवता) अशोक है अनुश्रुति (पीढ़ी दर पीढ़ी कानोंकान सुनी-सुनाई कहानी) ने चंपा नगरी के निवासी ब्राह्मण और उसकी कन्या के गोत्र और नाम को भुला दिया। काल-क्रम से यौजन प्राप्त करने पर उस कन्या ने अपने रूप, शील आदि से सबको चकित कर दिया। ज्योतिषियों ने उसके महारानी बनने की भविष्यवाणी की। धन के लोभी उस (चंपा के) ब्राह्मण ने अपनी पुत्री को पाटलिपुत्र ले जाकर राजा बिंदुसार के अनुपालन (बाद वाला पालन-पोषण) में दे दिया राजा की आज्ञा से वह कन्या राजमहल में भेज दी गई। अन्तःपुर की रानियां उसका रूप देखकर विस्मित हो गईं। वह कन्या सुंदर थी और पुण्य लक्ष्मणों से युक्त थी। ऐसा लगता था कि वह कन्या राजा बिंदुसार की राज्य-अधिदेवी हो।

राजा बिंदुसार की अनेक रानियां थीं। वह अन्यत्र लालित्य से बंधा था। अतः राजमहल की रानियों ने उस कन्या को परिचारिका के काम में लगा दिया। वह केश-श्मश्रु प्रसाधन का काम करती और राजा के शिर का तेल-मालिश का भी। उससे राजा को सुकून मिलता। उसके सुखस्पर्श से राजा को अभूतपूर्व आनंद मिलता और वह कुछ समय के लिए राज-काज के संक्षोभ (फजीहत) से छुटकारा-सा पा जाता। इस प्रकार वह सोए हुए राजा के केश-श्मश्रु का प्रसाधन करके चली जाया करती। उसके द्वारा इस प्रकार सेवा किए जाने पर राजा बिंदुसार हर्षित हुआ।

अशोक की होने-वाली मां ने भली-भांति सेवा करके बिंदुसार को प्रसन्न कर दिया। उसने अपने ब्राह्मण कन्या के होने और नापित-कन्या के न होने वाली बात से राजा को अवगत करा दिया। उसके रूप गुणों को देखकर राजा ने उस पर विश्वास कर लिया और दूसरी तरफ वह कन्या राजा के प्रति प्रीति-मनसा (मन से प्रीति करने वाली) हो गई। उसे देख कर राजा हर्षित हुआ, उसके हर्षित होने पर वह कन्या भी हर्षित हुई। राजा उस कन्या के गुण-संगीत से संतुष्ट होकर उसे उसका मनचाहा वर दिया। उस नापिती का वर था राजसिंहासन का अर्धभाग (अर्थात अग्रमहिषी का पद)। राजा ने राजा दशरथ आदि प्राचीन राजाओं की दृढता को याद करते हुए और तदनुकूल आचरण करते हुए उस कन्या को अग्रमहेशी के रूप में अंगीकार किया।

Published by pravendrakumar

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