अशोक द्वारा अपने भाइयों का वध

यह बात चतुर्थ शताब्दी ईसा पूर्व की है जब सम्राट अशोक मगध साम्राज्य की राजगद्दी पर बैठा।अशोक के उत्थान से उसका सारा मंत्रिमंडल हर्षित हुआ और शत्रुमंडल प्रभावहीन हो गया। राधगुप्त जैसे अमात्यवर्ग ने अशोक के मार्ग को सफलता की ओर उन्मुख कर दिया। पिंगलवत्स (आजीवक आचार्य) जिन्होंने यह भविष्यवाणी की थी कि अशोक ही राजा होंगे। एक दिन राजा अशोक से मिले और अशोक के भाइयों के विषय में सूचना दी। उन्होंने उनसे एक के विषय में बताया कि किस प्रकार अशोक का वह भाई बुरे कार्यों में लिप्त है। अपनी बात का खुलासा करते हुए उसने बताया कि अशोक का भाई महाराज बिंदुसार के समय से ही वार-नारियों की संगत में था। अंगूरी शराब पिए हुए, वह वारवधुओं के साथ रंगरेलियां करता फिरता है। पराई स्त्रियों के प्रसंग में लिप्त वह विशेष अवसरों पर क्षणिकाएं लाता है और उनके साथ रमण करता है। आपका एक अन्य भाई ग्रामीणों के साथ खेल-तमाशों में लिप्त रहता है और वनों-उपवनों में गोपालियों और मेषपालियों के साथ स्वच्छंदता के साथ व्यवहार करता है। आपके एक और भाई धनलोभी हैं और भाइयों के साथ धन-अपहरण में जुटे हैं। नगर के सेठ भयवस उन पर धन की वर्षा करते हैं। आपके पूज्य पितामह महाराजा चंद्रगुप्त के सहायक सेठ चंदनदास के पुत्र सेठ विपुलरत्न भी उनसे अत्यंत पीड़ित और दुखी है। धनदौलत का लोभी वह धन बटोरने में आकंठ डूबा है। सेठ रत्ननिधि जो धर्मनिष्ठ हैं। सदावर्त चलाते हैं, उनसे बहुतेरा धन वसूल लिया

आपके सभी भाई शास्त्रास्त्र के संग्रह में भी जुटे हैं यदि वे उन्मुक्त होकर कार्य करने लगें, तो शांति कहां रह पाएगी। इस प्रकार आचार्य पिंगलवत्स ने जो कुछ जानकारियां इकट्ठा की थी, उसे अशोक तक पहुंचा दी। इसके बाद वे अशोक की माता शुभा से मिलकर चले गए। दुर्बुद्धि भाइयों के घटिया प्रयासों के बारे में यतीईश्वर के मुंह से सुनकर अशोक ने राधगुप्त से सलाह-मशविरा किया‌। उसने गुप्त मंत्रणायें भी की राधगुप्त ने भी गुप्तचरों के मुंह से कुछ इस प्रकार की चर्चाएं सुनी थीं। राधगुप्त ने नीति की बातें कीं और कहा कि आदततायी जो भी हो उसका वध किया जाना चाहिए। राजा अशोक से उसने कहा -“हे प्रभो, आपके इन भाइयों के विषय में क्या कहा जाए‌। यदि वे धरती पर रह जाते हैं, तो हम स्वर्ग में होंगे।”इस प्रकार राजा अशोक ने दुर्बुद्धि और जनता के विरोध में तत्पर अपने भाइयों के विषय में मित्र की बातें सुनकर सुशील के मारे जाने के बाद बचे हुए अपने दो कम सौ सौतेले भाईयों को देहान्तर पहुंचा दिया।

Published by pravendrakumar

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