धन रुपी आश्रय जिसका नष्ट हो जाता है उसकी मित्रता से भी मनुष्य शिथिल हो जाते हैं। दरिद्रता से मनुष्य लज्जा को प्राप्त होता है, लज्जा को प्राप्त व्यक्ति तेजरहित हो जाता है, तेजहीन अपमानित होता है, अपमानित होने से ग्लानि को प्राप्त हो जाता है, ग्लानि युक्त शोक को प्राप्त होता है, शोकाकुल व्यक्ति को विवेक के द्वारा त्याग दिया जाता है, विवेकशून्य व्यक्ति नाश को प्राप्त हो जाता है। अहो! निर्धनता सब आपदाओं का निवास स्थान है।
दरिद्रता ही पुरुषों की चिंता का निवास स्थान है, परम अनादर का कारण है, दूसरी अनोखी शत्रुता है, मित्रों की घृणा है, स्वजन तथा अन्य लोगों के द्वेष का कारण है, वन में चले जाने का मन होता है और पत्नी द्वारा भी तिरस्कार होता है, हृदय में स्थित शोकानल भस्म नहीं करता, संतप्त करता रहता है।
बंधु लोग भी निर्धनता के कारण निर्धन पुरुष के कहने में नहीं रहते हैं, अत्यंत स्नेही मित्र भी विपरीत हो जाते हैं, आपत्तियां अधिक हो जाती हैं। शक्ति क्षय को प्राप्त हो जाती है, चरित्रवान, शीलवान पुरुष की शोभा धुंधली हो जाती है। जो दूसरों के द्वारा किया गया पाप कर्म है वह भी उसी का किया हुआ समझा जाता है।
कोई उसका साथ नहीं देता, नहीं कोई उसके साथ आदर से बोलता है, धनी लोगों के घर विवाहादि उत्सवों में गया हुआ दरिद्र व्यक्ति अनादरपूर्वक देखा जाता है, अल्प वस्त्र वाला होने से लज्जा के कारण बड़े लोगों से दूर ही घूमता रहता है। धन न होने के कारण ही पुरुष नारी तुल्य है और जो नारी है वह धन होने से पुरुष के समान है।
