Yajurveda in hindi

(क) शुक्ल यजुर्वेद-संहिता- (क) शाखा : माध्यन्दिन (वाजसनेय) २. काण्व। (ख) ब्राह्मण : शतपथ ब्राह्मण। (ग) आरण्यक : बृहदारण्यक। (घ) उपनिषद् : १.ईशोपनिषद् , २.बृहदारण्यक उपनिषद्। (ङ) कल्पसूत्र : (श्रौतसूत्र) कात्यायन श्रौतसूत्र। (गृह्यसूत्र) पारस्कर गृह्यसूत्र। (शुल्वसूत्र) १.बौधायन, २.मानव, ३.आपस्तम्ब, ४.कात्यायन, ५.मैत्रायणीय, ६.हिरण्यकेशि (सत्याषाढ), ७.वाराह शुल्वसूत्र। (ख) कृष्ण यजुर्वेद-संहिता। (क) शाखा : १.तैत्तिरीय, २.मैत्रायणीय, ३.कठ (काठक), ४.कपिष्ठल-कठ। (ख) ब्राह्मण : तैत्तिरीय ब्राह्मण । (ग) आरण्यक : तैत्तिरीय आरण्यक। (घ) उपनिषद् : १.तैत्तिरीय, २.कठ, ३.श्वेताश्वतर, ४.मैत्रायणीय (मैत्री), ५.महानारायण उपनिषद्। (ङ) कल्पसूत्र : (श्रौतसूत्र) १.बौधायन, २.वाधूल, ३.मानव, ४.भारद्वज, ५.आपस्तम्ब, ६.काठक, ७.सत्याषाढ, ८.वाराह, ९.वैखानस श्रौतसूत्र। (गृह्यसूत्र) १.बौधायन, २.मानव, ३.भारद्वाज, ४.आपस्तम्ब, ५.काठक, ६.आग्निवेश्य, ७.हिरण्यकेशि, ८.वाराह, ९.वैखानस, १०.चारायणीय, ११.बैजवाप गृह्यसूत्र। (शुल्बसूत्र) शुक्ल यजुर्वेद- वत्।

यजुर्वेद शब्द यजुष्/यजुस् से बना है। यजुर्वेद के यजुष् शब्द की कई व्याख्याएं प्रस्तुत की गई हैं, जो विभिन्न दृष्टिकोण के सूचक हैं। यजुष् के मुख्य अर्थ हैं- (१) ‘यजुर्यजते:’ (नियुक्त ७.१२) अर्थात् यज्ञ से संबद्ध मंत्रों को यजुष् कहते हैं। (२) ‘इज्यतेऽनेनेति यजु:’ अर्थात जिन मंत्रों से यज्ञ किया जाता है, उन्हें यजुष् कहते हैं। यजुर्वेद का यज्ञ के कर्मकांड से साक्षात् संबंध है, अतः इसे ‘अध्वर्युवेद’ भी कहता कहा जाता है। यज्ञ में अध्वर्यु नामक ऋत्विज् यजुर्वेद का प्रतिनिधित्व करता है और वही यज्ञ का नेतृत्व करता है। अतएव सायण ने कहा है कि वह यज्ञ के स्वरूप का निष्पादक है।

यजुर्वेद का विषय कर्मकांड है। पातंजल महाभाष्य के अनुसार यजुर्वेद की 100/101 शाखाएं हैं, जिनमें कृष्ण यजुर्वेद की 85 / 86 तथा शुक्ल यजुर्वेद की 15 शाखाएं हैं। आज 6 शाखाएं ही प्राप्त हैं, जिनमें शुक्ल यजुर्वेद की दो – १.माध्यन्दिन या वाजसनेयि, २. काण्व। यजुर्वेद का ऋत्विज-अध्वर्यु, देवता-वायु और ऋषि-वैशम्पायन हैं। यजुर्वेद गद्य पद्यात्मक है।गद्य-पद्य मिले होने के कारण से ही इसके 1 भाग को कृष्ण यजुर्वेद कहते हैं।

यजुर्वेद के दो संप्रदाय हैं आदित्य संप्रदाय और ब्रह्म संप्रदाय। आदित्य संप्रदाय का वेद शुक्ल यजुर्वेद है और ब्रह्म संप्रदाय का वेद कृष्ण यजुर्वेद है। शुक्ल यजुर्वेदीय संहिता 40 अध्याय और 1975 मंत्रों में विभक्त है, कृष्ण यजुर्वेदीय संहिता 40 अध्याय और 2086 मंत्रों में विभक्त है।

यजुर्वेद के महत्वपूर्ण अध्याय- १. अध्याय 9 और 10 : इसमें राजा का राज्याभिषेक राजा के अधिकार और कर्तव्यों का वर्णन है। २. अध्याय 11 : विज्ञान की दृष्टि से यह अध्याय बहुत महत्वपूर्ण है इसमें जल के मंथन से विद्युत (hydro-electricity) का उत्पादन, उत्खनन(drilling) के द्वारा पूरीष्य अग्नि (तेल और प्राकृतिक गैस, oil and natural gas) का निकालना आदि। ३. अध्याय 9 : इसके एक मंत्र में सूर्य में हाइड्रोजन और हीलियम गैस के होने का स्पष्ट उल्लेख है। ४. अध्याय 16 : यह रुद्राध्याय है। इसके द्वारा शतरुद्रीय होम किया जाता है। इसमें रुद्र के विराट रूप का वर्णन है। इसमें रूद्र के शिव और रूद्र दोनों रूपों का वर्णन है। ५. अध्याय 31 और 32 : अध्याय 31 पुरुषसूक्त है। इसे विष्णुसूक्त भी कहते हैं। अध्याय 31 और 32 में विराट् पुरुष का वर्णन है। उससे ही सृष्टि की उत्पत्ति होती है। उससे ही ब्राह्मण आज चारों वर्ण उत्पन्न हुए हैं। ६. अध्याय 34 : इस अध्याय की प्रथम 6 मंत्र शिवसंकल्प सूक्त या शिवसंकल्प उपनिषद् कहे जाते हैं। इसमें ‘तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु’ दिया गया है अर्थात् हमारा मन शुभ विचारों से युक्त हो। ७. अध्याय 40 : इसको ईशोपनिषद् या ईशावास्य उपनिषद् कहते हैं। यह यजुर्वेद का अंतिम अध्याय है और उपनिषदों में इसे प्रथम स्थान मिला है। इसको उपनिषदों की आधारशिला माना जाता है। यह अध्याय दार्शनिक और आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

Published by pravendrakumar

I am Pravendra Kumar. I am doing research in Sanskrit language. I want to share the knowledge of Sanskrit language in own words. Sanskrit language is a precious language of the world. It is the mother language of all Indian languages. The words of Sanskrit language are present in all Indian languages. Sanskrit is the ancient Indian language. It is the origin of all Indian languages. The Indian culture is present in this language. All ancient Indian epics written in Sanskrit language like Vedas, Upnishadas, Puranas, Mahabharat, Bhagwat Geeta, Ramayan, etc.

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