सामवेद-संहिता- (क) शाखा : १.कौथुम, २.राणायनीय, ३.जैमिनीय। (ख) ब्राह्मण : (कौथुमीय) १.तांड्य महाब्राह्मण(पंचविंश या प्रौढ), २.षड्विंश ब्राह्मण (एवं अद्भुत ब्राह्मण), ३.सामविधान, ४.आर्षेय, ५.मंत्र (या उपनिषद्), ६.देवताध्याय, ७.वंश, ८.संहितोपनिषद् ब्राह्मण। (जैमिनीय) १.जैमिनीय (आर्षेय), २.जमिनीय तवल्कार, ३.जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण। (ग) आरण्यक : ×। (घ) उपनिषद् : १.छान्दोग्य, २.केनोपनिषद् । (ङ) कल्पसूत्र : (श्रौतसूत्र) १.आर्षेय (या मशक) कल्पसूत्र, २.क्षुद्र कल्पसूत्र, ३.जैमिनीय श्रौतसूत्र, ४.लाट्यायन श्रौतसूत्र, ५.द्राह्यायण श्रौतसूत्र, ६.निदान सूत्र, ७.उपनिदान सूत्र। (गृह्यसूत्र) : १.गोभिल, २.कौथुम, ३.खादिर, ४.द्राह्यायण, ५.जैमिनीय गृह्यसूत्र। (अप्रकाशित), ६.गौतम, ७.छान्दोग्य, ८.छन्दोग गृह्यसूत्र।
सामन् या साम का अर्थ : गीतियुक्त मंत्र है। साम के लिए गीतयुक्त होना अनिवार्य है। ऋग्वेद के मंत्र (ऋक् या ऋचा) जब विशिष्ट गान-पद्धति से गाए जाते हैं, तब उनको सावन् (साम) कहते हैं। अतएव पूर्वमीमांसा में गीति या गान को साम कहा गया है। ‘गीतिषु सामाख्या’ (ऋग्॰ २.१.३६) ।
पातंजल महाभाष्य के अनुसार सामवेद की 1000 शाखाएं हैं, परंतु केवल 3 शाखाएं ही उपलब्ध है- कौथुमीय, राणायनीय, जैमिनीय । सामवेद के शिक्षा या प्रातिशाख्य तीन है- नारदीय शिक्षा,ऋक् तन्त्र शिक्षा और पुष्यसूत्र प्रातिशाख्य। सामवेद पूर्णत: ऋगाश्रित है, क्योंकि इसके 1875 मंत्रों में से 1800 मन्त्र ऋग्वेद की शाकल संहिता से लिए गए हैं। सामवेद में दो छंदों का प्रयोग हुआ है-१.गाथा, २.प्रगाथा।
सामवेद की राणायनीय शाखा दक्षिण प्रांत में और कौणामीय विंध्याचल से लेकर उत्तर भारत में तथा जैमिनीय केरल प्रांत में प्रचलित है। कौथुमीय शाखा को उच्चारण भेद से नागर पद्धति तथा मद्र पद्धति नामक दो पद्धतियों में विभक्त किया गया है।
सामवेद के देवता-सूर्य, ऋत्विक-उद्गाता हैं। सामवेद का विभाजन दो आर्चिकों- पूर्वार्चिक और उत्तरार्चिक मैं विभाजित किया गया है। गान 4 प्रकार के हैं- १.ग्राम्य/वेय/प्रकृति, २.अरण्यगान, ३.ऊह गान, ४.ऊह्य गान/रहस्यगान। सामगान की भक्तियां 5 प्रकार की हैं -१.प्रस्ताव, २.उद्गीथ, ३.प्रतिहार, ४.उपद्रव, ५.निधन । सामविकार 6 होते हैं – १.विकार, २.विश्लेषण, ३.विकर्षण, ४.अभ्यास, ५.विराम, ६.स्तोभ ।
